धान बेचना मुश्किल, अफीम के लिए सुपर मार्केट
जीटी रोड पर बाराचट्टी थाने से पांच किलोमीटर दक्षिण 60-70 घरों का गांव बिग्घी है। पश्चिम में पहाड़ और वन विभाग की जमीन है। बीच में गेहूं, चने, अरहर और सरसों के खेत। हरियाली और पीले फूलों के दरम्यान अफीम के सफेद फूलों वाले इक्का दुक्का खेत के टोपरे। सोमवार को हुई बारिश से खेत गीले थे। अफीम की खेती का यह अंदाज किसी से छिपा नहीं लेकिन गांव वाले बस एक ही बात कहते हैं, हमको नइ पता। दूर से किसी को कुछ पता नहीं चलता है। नजदीक आने पर इनके गोल-गोल हरे फल में लगे चीरा को देखकर मालूम होता है कि इनसे अफीम बनाने के लिए रस निकाला जा चुका है। अब यह किसी झाड़-जगल वाली जगह पहुंच चुका होगा जहां इससे अफीम का पाउडर तैयार कर लिया गया होगा। अगर यह फल बच गये तो इसके अंदर मिलने वाला पोस्तादाना आसपास ही मिल जाएगा। जानकार बताते हैं कि अफीम के फल से मिलने वाले पांच लीटर रस से सौ ग्राम अफीम पाउडर तैयार होता है। इसकी कीमत अलग-अलग मार्केट में पचास हजार से एक लाख रुपये प्रति किलो तक है।गांव के पुरुषों से इसके बारे में पूछे हर सवाल का जवाब मिलता है, हमें नहीं पता। कुछ लोग तो इसके फल-फूल को पहचानने से भी इनकार कर देते हैं। पीछे खड़ी महिलाओं की दबी मुस्कान कुछ पता देती है। बच्चाे भी कुछ बता देते हैं। जैसे, दो बार लसलसा पदार्थ निकाला जाता है। इसके डंठल व पत्ते को सुखाकर डोडा तैयार किया जाता है। डोडा पीकर लोग मस्त रहते हैं। डोडा लाइन होटल में मिल जाएगा। इसकी जानकारी देने के लिए कोई तैयार नहीं होता कि जिस जमीन पर इसकी खेती लहलहा रही है वह किसकी है। एक जगह वन विभाग का बोर्ड लगा है। मगर वन विभाग के लोग भी यही कहते हैं कि उनकी जानकारी में उनकी जमीन पर अफीम की खेती नहीं होती।इस गांव से पहले और इसके बाद सड़क की हालत, घरों का स्तर, स्कूलों का हाल और दूसरी वैसी हर बात मिलती है जो नक्सली प्रचार के लिए जरूरी होती है। पुलिस वाले भी कहते हैं कि इन खेतों से मिलने वाली आमदनी नक्सली ले जाते हैं
सब कुछ खुले में होता है तो कंट्रोल की जिम्मेवारी किसकी
स्थानीय लोग कहते हैं कि जब सबकुछ खुले में है तो उसपर कंट्रोल की जिम्मेदारी किसकी है। गांव वाले कहते हैं कि अधिकारी तो किसी काम से नहीं आते। कोई यह कहने-बताने भी नहीं आया कि अफीम की खेती नहीं करनी है। मजेदार बात यह है कि पुलिस के एक अफसर इसकी खेती का पता लगाने के लिए सैटेलाइट इमेज की बात तो करते हैं लेकिन कोई थानेदार ऐसे किसी गांव में पहुंचा हो तो गांव वालों ने नहीं देखा। हां, बीच-बीच में सीआरपी वाले फसल नष्ट करने जरूर आते हैं।
अफीम की खेती रोकना बस में नहीं या मन में नहीं
जिस दिन सीआरपीएफ की टीम अफीम की खेत नष्ट करती आती है उस दिन मालूम होता है कि यह कितनी खतरनाक है। उस दिन बताया जाता है कि इसकी खेती से होने वाली आमदनी नक्सलियों को जाती है। यह भी बताया जाता है कि नक्सली खुद इसकी खेती करते हैं। अब यह खतरा भी सामने आ रहा है कि इन खेतों में ही नक्सलियों ने बारूदी सुरंग बिछा रखी हो। इन सबके बावजूद अफीम की खेती रुकती क्यों नहीं? हमने यही सवाल सूबे के एक सीनियर आईपीएस अधिकारी से पूछा तो उनका जवाब भी सवाल वाला ही था, भाई साहब इसे रोकना किसकी प्राथमिकता में है। पुलिस से पूछिएगा तो वह कहेगी कि इसे रोकना नारकोटिक्स वालों की जिम्मेदारी है। नारकोटिक्स वाले इसे रोकना चाहते हैं, इसके लिए उनकी कोई कोशिश किसी को नजर नहीं आती। सीआरपीएफ के लिए भी यह इतना आसान काम नहीं और ऐसे काम उसकी मूल जिम्मेदारी में शामिल भी नहीं। अब जबकि खेतों में बारूदी सुरंग का खतरा भी है तो उसके लिए भी वहां जाना मुश्किल होगा।
जिले में तैनात पुलिस के मौजूदा अधिकारी यही कहते हैं कि पुलिस की ओर से इस पर नजर रखी जाती है और आवश्यकतानुसार कार्रवाई भी होती है। जिन गांवों में इसकी खेती होती है, वहां सबको पता होता है कि इसमें कुछ गड़बड़ है लेकिन कोई कुछ बताता नहीं। सब यह जरूर बताते हैं कि उनके गांव में कोई कभी यह बताने नहीं आया कि अफीम की खेती गैरकानूनी है। जो बात उन्हें इससे बचने के लिए मजबूर करती है वह इसके धंधे से जुड़े लोग ओर उनसे जुड़ी बातें होती हैं। अगर इसकी खेती से नक्सली जुड़े हों तो किसती हिम्मत है कुछ कहने की। इस खतरनाक खेती के न रुकने की वजह इसके खेत का स्वामित्व भी है। गांव वाले कहेंगे जमीन वन विभाग की है। वन विभाग के लोग कहेंगे जमीन बिहार सरकार की होगी। सरकार के लोग यानी स्थानीय प्रशासन के लोग इन इलाकों में देखे नहीं जाते तो यह तय कैसे हो कि जमीन किसकी है। अलबत्ता जब कार्रवाई होती है तो राजस्व कर्मचारी को पकड़ा जाता है।
वन विभाग की जमीन पर अफीम की खेती की सूचना अभी तक नहीं मिली है। कुछ इलाकों में बिहार सरकार की जमीन है, जिस पर स्थानीय लोगों द्वारा अफीम की खेती की जाती है। अफीम की खेती को लेकर सीआरपीएफ व पुलिस के जवान भी अक्सर कार्रवाई करते हैं।
- डॉ के. नेशामणि, डीएफओ, गया
धान बेचना मुश्किल, अफीम के लिए सुपर मार्केट
किसानों के लिए सौ-दो सौ क्विंटल धान बेचना कितना मुश्किल है, यह किसी भी क्रय केन्द्र पर जाकर मालूम किया जा सकता है। दूसरी ओर झारखंड से लगी सीमा पर बसे गया के गावों में अफीम की खेती करने वालों के लिए एक ग्राम अफीम के लिए बाजार कोई समस्या नहीं है। अफीम का पाउडर खरीदने के लिए जिनकी जेब तंग होती है, उनके लिए इसके पौधों के डंठल और पत्ते से बनने वाला डोडा पीने का विकल्प होता है। बाजार के जानकार बताते हैं कि एक ग्राम अफीम की कीमत ढाई सौ से पांच सौ रुपये तक होती है। इस कारोबार के लिए जीटी रोड, इसके किनारे फलते फूलते ढाबे और इससे जुड़े शहर बाजार का राजमार्ग बनते हैं। इस राजमार्ग पर छोटी-मोटी कश तो ड्राइवर भी लगा लेते हैं लेकिन इसके लिए पैसे तो कोलकाता, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर, भोपाल, अंबिकापुर, जयपुर और श्रीगंगानगर में मिलते हैं। इस साल बाराचट्टी के इलाके में सीआरपीएफ के जवानों ने तो अफीम के पौधों को नष्ट किया है। इनके साथ पुलिस का कोई अधिकारी भी रहता है लेकिन किसी आरोपित को सख्त सजा मिलने की सूचना नहीं है। इस साल अबतक 19 लोगों पर अफीम खेती के आरोप में एफआईआर दर्ज की गयी है।
कौड़ी से शुरू हुआ अफीम का कारोबार आज करोड़ों में
पुलिस सूत्रों के अनुसार इस इलाके में दस साल पहले कौड़ी से शुरू हुई अफीम की खेती का कारोबार आज करोड़ों का हो चुका है। उस समय तत्कालीन डीआईजी अर¨वद पासवान के नेतृत्व में पांच एकड़ में लगी अफीम की फसल नष्ट की गयी थी। सन दो हजार आठ में मोहनपुर प्रखंड के अंजामा गांव में अफीम के अस्सी हजार से अधिक पौधे नष्ट किये गये थे। दो साल पहले राज्य सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री ने बाराचट्टी में तीस एकड़ में अफीम की खेती की बात स्वीकार की थी।
जब जानकारी मिलती है तो अफीम की खेती के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। हमें मालूम है कि कई मामलों में जानकारी हुई लेकिन इसकी पुख्ता जानकारी कोर्ट से मिल सकती है।
- राकेश कुमार, सिटी एसपी, गया
No comments