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महुआ और बीड़ी के सहारे जी रहे आदिवासी

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निरंजन कुमार. चंद्रमंडीह (जमुई)। मानव सभ्यता जहां एक ओर विकास की नई उंचाईयों को छू रहा है। वहीं जंगलों पहाड़ों में रहने वाले आदिवासी समाज के लोग आज भी पाषण कालीन सभ्यता जैसी जिंदगी जीने को मजबूर है। जंगलों व पहाड़ों से अच्छे संबंध रखने वाले इस जाति के लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल व आवास जैसी जिंदगी की मुलभूत सुविधाओं से वंचित जानवरों सी जिंदगी जी रहे हैं। घने जंगलों में रहने वाले इस समुदाय के लोग आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। सरकार द्वारा संचालित कल्याण कारी योजनाओं का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है। दुर्गम तक पहुंचने वाले घने जंगलों व पहाड़ों में रहने इन सभी लोगों की सूधी लेने बाला कोई नहीं है। आधुनिक दुनियां प्राकृतिक संसाधनों से बेमुश्किल इनका गुजर बसर हो पा रहा है। महुआ चुनना व सखुआ पत्तों का पतल बनाना बीड़ी बेचकर किसी तरह ये दो जून की रोटीयां जुटा पाते है। वहीं लकड़ी माफियाओं द्वारा जंगलों की अवैध कटाई से इनके समक्ष रोजगार की समस्या उतपन्न हो गई है। भूखमरी की कगार पर खड़े लोग समाज की मुख्य धारा से बिमुख होने को मजबूर है। प्रखंड के दर्जनों गांव जैसे कुड़वा, फिटकोरिया, बरमसिया, रहिमा, बेलखरी, खुटमो, बेंद्रा, सिकठिया, दोतना आदि आदिवासी बहुल गांव में पेयजल का घोर आभाव है। कुड़वा तथा फिटकोरिया सहित कई टोले में पेयजल के लिए एक कुंआ है। वह भी गरमी के मौसम में सुख चुका है। यहां के लोग पहाड़ के तलहटियों से पानी लाकर किसी तरह अपना जीवन गुजर बसर कर रहै है। इन ईलाकों में जल स्श्रोत सुख चुका है. वहीं सड़क की व्यवस्था नहीं रहने के कारण इस क्षेत्र के रोगियों को खाट पर टांक कर बामदह या चकाई बाजार लाते है। इस गांव में विद्यालय तो है लेकिन ग्रामीणों ने बताया कि पिछले कई माह से इस विद्यालय में कोई शिक्षक नहीं आते है और नाही मध्यान्ह भोजन चलता है। वहीं बीईओ जवाहरलाल राय ने बताया कि विद्यालय में शिक्षक नहीं आने की बातों पर कहा कि जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

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