बलिदान का प्रतीक है दरौंदा का भैया-बहिनी मंदिर
कई जिलें के श्रद्धालु आकर मांगते हैं मन्नत
सिवान। दारौंदा प्रखंड के भीखाबांध स्थित भैया-बहिनी मंदिर आस्था के साथ ही भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक का भी केन्द्र है। दारौंदा प्रखंड मुख्यालय से 12 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में महाराजगंज-जनता बाजार मुख्य पथ पर भीखाबांध के पास स्थित है। यूं तो सालो भर यहां श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना कर मन्नतें मांगते हैं, पर श्रावण पूर्णिमा और भाद्र शुक्ल पक्ष अनंत चतुर्दशी के दिन सिवान, सारण, गोपालगंज, पश्चिमी व पूर्वी चंपारण व पटना आदि जिलों के अलावे यूपी व झारखंड से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते है व मन्नतें मांगते हैं।
लोक कथा प्रचलित है कि मुगल शासन काल में एक व्यक्ति अपनी बहन की रक्षा बंधन के दो दिन पूर्व उसके ससुराल भभुआ से विदा कराकर अपने घर ले जा रहा था। भीखाबांध के समीप मुगल सैनिकों की नजर उन पर पड़ी। महिला की सुंदरता देखकर सिपाहियों की नीयत खराब हो गई और डोली को रोककर उसकी बहन के साथ बदतमीजी करने लगे। इस पर साथ वह बहन की रक्षा के लिए सिपाहियों से युद्ध करने लगा। सिपाहियों की संख्या अधिक होने के कारण भाई कमजोर पड़ गया और मार डाला गया। बहन खुद को असहाय देखते हुए भगवान को पुकारने लगी। कहा जाता है कि एकाएक धरती फटी और दोनों धरती के अंदर चले गए। डोली लेकर चल रहे चारो कहारों ने भी बगल के कुएं में कूद अपनी जान दे दी थी। जहां भाई-बहन धरती में समाए थे, वहीं दो बरगद के पेड़ उग आए। दोनों वट वृक्ष ऐसे है देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि भाई अपने बहन की रक्षा कर रहा है। वट वृक्ष अब करीब पांच बीघा जमीन में फैल गया है। वहीं पर पहले मिट्टी का मंदिर बना और इसके बाद जैसे-जैसे मंदिर की महत्ता बढ़Þी, बाद में श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया। यह अब श्रद्धा का केंद्र बन गया है। भीखाबांध निवासी देवनाथ सिंह रोजाना जगने से साथ मंदिर पहुंचकर साफ सफाई व पूजा करते हैं। मंदिर की देखरेख भीखाबांध निवासी स्व.राजेन्द्र प्रसाद के पुत्र शिशुपाल कुमार करते हैं।
अतिक्रमण का शिकार हुआ परिसर
मंदिर के लिए आज तक कोई पूजा समिति नहीं हैं और न हीं इसके बचाव की कोई पहल की गई है। इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर में कभी छह बीघा में फैला वटवृक्ष अब कुछ ही कट्ठो में अतिक्रमण के कारण सिमट गए हैं। भूमि पर मकान व दुकान बनाकर अतिक्रमण किया जा रहा है।
जुटते हैं श्रद्धालु
यह एक तरह से बलिदान स्थल है। इस स्थान के प्रति लोगों में अटूट आस्था रही है। पूजा के वक्त यहां काफी भीड़ लगती है। लोगों की मान्यता है कि यहां मन्नतें पूरी होती हैं। राखी के दिन यहां पेड़ में भी राखी बांधी जाती है। लोग यहां राखी चढ़ाकर भी अपने भाइयों की कलाई में बांधते हैं।
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