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न्यूनतम मजदूरी न देना जुर्म है :दिल्ली हाई कोर्ट

नई दिल्ली

एक गरीब मजदूर के न्यूनतम मजदूरी पाने के हक को कानूनी संरक्षण देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता द्वारा अपने किसी कर्मचारी को उस वक्त की न्यूनतम मजदूरी देने से इनकार करना जिस दौरान उस कर्मचारी ने उसके पास काम किया हो, न केवल अवैध और अनैतिक है, बल्कि इसके लिए आपराधिक कार्रवाई को भी बुलावा देता है।

जस्टिस सी. हरिशंकर की बेंच ने सेंट्रल सेक्रेटेरिएट क्लब को निर्देश दिया है कि वह अपने यहां माली का काम कर चुके गीतम सिंह को उनकी न्यूनतम बकाया मजदूरी के 50,000 रुपये दें। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा बर्ताव समाजवादी समाज के मूल तत्व के विरुद्ध है, जो संविधान की प्रस्तावना के तहत हमें ऐसा बनने की सीख देता है और संविधान के तहत हर नागरिक के लिए उस वादे को पूरा करना अनिवार्य है।

अदालत ने लेबर कोर्ट के फैसले में खामी को उजागर करते हुए कहा कि उसने गीतम की आय अक्टूबर 1992 से लेकर सितंबर 1995 के बीच सीमित करके सही नहीं किया। सिंह ने 1 सितंबर 1989 से लेकर सितंबर 1995 तक काम किया और उन्हें उस वक्त की न्यूनतम मजदूरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि वह क्लब के गैरमामूली आपराधिक बर्ताव को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती।

लेबर कोर्ट ने 16 जुलाई 2014 के इस क्लब को निर्देश दिया था कि वह सिंह को अक्टूबर 1992 से लेकर सितंबर 1995 में काम के लिए न्यूनतम भत्ते के तौर पर 15,240 रुपये दे। सिंह ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें कहा गया कि उन्होंने सितंबर 1989 से 30 सितंबर 1995 तक इस क्लब में काम किया, जहां उन्हें दी जानी वाली न्यूनतम आय और मिनिमम वेजेज एक्ट, 1948 एक्ट के तहत न्यूनतम आय में काफी अंतर मिला।

क्लब के प्रशासन ने सिंह के दावों का खंडन किया और कहा कि वह कोई इंडस्ट्री नहीं है और उसकी सदस्यता सिर्फ सेंट्रल सेक्रेटेरियट के कर्मचारियों तक सीमित है। उन्होंने सिंह पर देरी से दावा ठोकने का भी आरोप लगाया। हाई कोर्ट ने क्लब की दलीलें ठुकरा दीं और सिंह की अपील मंजूर कर ली।

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