राजनीति की प्रयोगशाला बिहार एक और परीक्षण के लिए तैयार
राजेन्द्र धोड़पकर
माना जाता है कि डॉक्टर को शरीर के बारे में या मैकेनिक को मशीन के बारे में आम लोगों से ज्यादा मालूम होता है। यह सच है यह भी मान लेने में ही भलाई है हालांकि कई लोग मानते हैं कि वे डॉक्टरों या मैकेनिकों से ज्यादा जानते हैं। उनके शरीर का और मशीनों का क्या हाल होता है, यह अलग विषय है। इसी तरह राजनेताओं को राजनीति के बारे में आम जनता से ज्यादा मालूम होता है, इसीलिए वे राजनीति करते हैं और आम जनता राजनीति भुगतती है। इसका एकमात्र अपवाद बिहार है। यहां आम लोग राजनेताओं से ज्यादा राजनीति और राजनेताओं को जानते हैं। बाकी जगह लोग यह कह सकते हैं कि हमें राजनीति से क्या, हमें तो दाल रोटी से फुरसत नहीं मिलती। बिहार में बड़े से बड़ा और अदना से अदना आदमी आपको बताएगा- हम स्थिति को बहुत डीपली स्टडी किए हैं। अगर लालू जी उधर हुए तो सारा अपर कास्ट वोट इधर पोलराइज हो जाएगा लेकिन जो माइनोरिटी वोट है वह हमारे क्षेत्र में 15.4 प्रतिशत है..। बिहार का एक एक आदमी दस योगेंद्र यादवों पर भारी पड़ सकता है।
सवाल यह है कि ऐसा होते हुए बिहार की ऐसी स्थिति क्यों है? या यूं कहें कि बिहार की राजनीति, आदर्श राजनीति क्यों नहीं है? आधुनिक काल में चंपारण सत्याग्रह से लेकर तो जेपी आंदोलन और मंडलवादी परिवर्तन का मुख्य केन्द्र बिहार रहा। जद (यू) और भाजपा की मिली जुली सरकार भी कई वजहों से भारतीय राजनीति का अनोखा प्रयोग रही। बिहार एक मायने में भारतीय राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। जैसे किसी संस्थान के बाकी विभागों में स्थिरता रहे लेकिन प्रयोगशाला में हर वक्त अस्थिरता होती है, नए-नए प्रयोग होते रहते हैं, वैसे ही बिहार है।
यह चुनाव भी एक प्रयोग है, एक तरफ भाजपा दूसरी ओर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव। ऐसा नहीं लगता कि इसके बाद भी राजनीति स्थिर होगी लेकिन अच्छी बात यह है कि सामाजिक ताकतों और समूहों का समीकरण पिछले कुछ सालों से एक संतुलन की ओर बढ़ता हुआ दिख रहा हैं।भले ही ऐसा सतही तौर पर लगे कि मंडल बनाम मंदिर के दिन तो नहीं लौट रहे हैं,लेकिन ऐसा है नहीं,राजनीति अब वापस नहीं लौट रही है। अब बिहारवासी जो भी फैसला करेंगे, जनादेश सबके साथ सारे समूहों के सौहार्दपूर्ण विकास का होगा। नारे कुछ भी उछाले जाएँ राजनीति का मुहावरा बिहार में बदलने लगा है और इसे आम बिहारवासी से बेहतर कौन समझ सकता है। बिहारवासियों की राजनीतिक चेतना प्रयोगों की भट्टी में तपने के बाद बेहतर की हकदार है। यह चुनाव पीछे ले जाने वाला नहीं, आगे ले जाने वाला होगा। from livehindustan.com
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