बिहार चुनाव की घोषणा और चुनौतियां
शीतला सिंह
बिहार चुनाव महासंग्राम की घोषणा हो गई है। यह 12 अक्टूबर से 5 नवम्बर के बीच 5 चरणों में होगा। दीपावली के पूर्व 8 नवम्बर को परिणाम भी आ जाएंगे। अब यह राजनीतिक दलों और चुनाव उम्मीदवारों पर निर्भर करता है कि वे इस मुकाबले में चुनाव आयोग की आचार संहिता से बचते हुए कैसे सफलता तक पहुंचने के लिए प्रयास करते हैं। साथ ही बिहार के 37 जिलों में 29 को नक्सल प्रभावित बताए जाते हैं, वे चुनाव के रास्ते का अनुसरण तो करेंगे नहीं। उनका प्रभाव क्षेत्र किस प्रकार की रणनीति अपनाता है, वे किसे अपना दोस्त और दुश्मन बताते और बनाते हैं, इस रणनीति का निर्वाह उन्हें ही करना है। हथियारों के बल पर क्रान्ति और जनसमर्थन दोनों में तालमेल क्या संभव हो पाएगा, इसका प्रभाव भी चुनाव पर पड़े बिना नहीं रहेगा।
जहां तक राजनीतिक दलों, गठबंधनों और महागठबंधनों का सम्बन्ध है, उन सब में चरमराहट दिख रही है। वहीं निष्पक्ष चुनाव बड़ा सवाल है। यह लोकतंत्र की आवश्यकता है। यह कहां-कहां से प्रभावित होता है जिसके फलस्वरूप चुनाव में विकृतियां आती हैं। इसे रोकना चुनाव आयोग का काम है। लेकिन चुनाव को प्रदूषित होने से बचाने के लिए क्या-क्या रास्ता अपनाया जाएगा जिससे मतदाता मतदेय स्थलों तक पहुंचकर निष्पक्षता और अपनी इच्छानुसार अपने मत मनपसन्द उम्मीदवार को दे सकें, यह सबसे बड़ी आवश्यकता है। चुनाव को प्रभावित करने वाले जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र और कालाधन इस कार्य में कितने सहायक होते हैं, इसे रोकने के लिए आयोग अपने ढंग से प्रयास करता ही है लेकिन कठिनाई यही है कि आज तक कोई भी चुनाव इन विकृतियों से पूर्ण मुक्त नहीं माना गया। जनप्रतिनिधित्व कानून में चुनाव के लिए अधिकतम खर्च की सीमा का निर्धारण किया गया है, इसके लिए आदर्श आचार संहिता की घोषणा के साथ क्षेत्र में पर्यवेक्षकों की भी नियुक्ति आयोग द्वारा होती है। इसका चयन बाहर के प्रशासनिक क्षेत्र से किया जाता है जिससे वे निष्पक्षता के साथ चुनाव आयोग के अधिकारों का प्रयोग करें और इसे दूषित होने से बचाएं। जहां तक चुनाव खर्च और उसकी सीमा का सम्बन्ध है, उसके अनुपालन में दो कठिनाइयां आती हैं। कानून में ही यह बता दिया गया है कि पार्टी, मित्रों और रिश्तेदारों द्वारा किया गया खर्च उम्मीदवार का नहीं माना जाएगा लेकिन भला इस बात को कौन कहे कि इन दोनों का लाभ अन्तत: उम्मीदवार को ही मिलना है। देश में कालाधन जिस प्रकार अर्थव्यवस्था में निर्णायक की भूमिका निभा रहा है उससे राजनीति और चुनाव मुक्त रहेंगे, क्या यह संभावित है।
चुनाव खर्च और प्रचार में असीमित धन का प्रयोग तभी रुक सकता है जब उम्मीदवार के हाथ में खर्च करने और मनमानी प्रचार करने की स्वतंत्रता ही न रहे, यह काम चुनाव आयोग करे। वही सबके सम्बन्ध में जानकारियां कराए, जो कानून के अनुसार प्रभावी भूमिका अदा करे, लेकिन इसके खिलाफ तर्क यह दिया जाता है कि विभिन्न दलों के उम्मीदवारों के कार्यकतार्ओं को जनता के बीच जाने से तो रोका नहीं जा सकता, वे अपनी भूमिकाओं का निर्वाह किस प्रकार कर रहे हैं और उन पर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है यह सबसे बड़ा सवाल है। वह मतदाता से क्या बात और उसे प्रभावित करने के लिए किन तरीकों का प्रयोग कर रहा है, ऊपर से दिखाने के लिए तो यही कहा जाएगा कि वह जागरूक नागरिक के रूप में लोकतंत्र की भूमिका को मजबूत करने के लिए जनजागरण का कार्य कर रहा है लेकिन उसका स्वरूप और प्रस्तुति किस प्रकार की हो रही है उस पर क्या नियमन, नियंत्रण संभव है। यह संविधान में दिए गए जनता के मूल अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है जिस पर अंकुश लगाने के लिए तरीकों की खोज आसान नहीं, बल्कि मुश्किल होती है। जहां तक धर्म, जाति और साम्प्रदायिकता का प्रश्न है, इसका इस्तेमाल कैसे रुके यह भी कठिन प्रश्न है। जातीय आधार बड़ा मजबूत है और संवैधानिक रूप से देश में आरक्षण के लिए भी इस जातीय आधार को ही खोजा और स्वीकार किया गया है, इनके अपने संगठन और साधन भी हैं। गुजरात में पाटीदार आन्दोलन के नाम पर जिस बड़ी सभा का आयोजन किया गया उसके नेता हार्दिक पटेल का भी यही कहना है कि हम तो इस जातीय आधार को ही पूरे देश में मजबूत बनाएंगे और यही वोट देने के लिए भी प्रयुक्त हो। यह प्रचारित न सही वैयक्तिक और छिपे तौर पर ही मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए प्रयुक्त होगा, इसे कैसे रोका जा सकता है। धर्म लम्बे अरसे से राजनीति को प्रभावित करने का काम कैसे प्रभावी ढंग से करे, इसके लिए प्रयत्न और आन्दोलन होते रहे। धर्म के आधार पर संगठन भी बने और चुनाव मैदान में भी आए। यह भी तर्क दिया जाता है कि देश के विभाजन के बाद हिन्दू महासभा, रामराज्य परिषद, भारतीय जनसंघ और मुस्लिम लीग जैसे संगठन पहले चुनाव मैदान में उतरे थे, लगता था कि देश के विभाजन के फलस्वरूप इनको लाभ पहुंचेगा लेकिन जनता ने उन्हें नकारा लेकिन जब निर्वाचित संगठन जन आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं करते तो यह भी देखने में आया है कि धर्म कैसे राजनीति को प्रभावित करने वाला तत्व बन गया और उसका लाभ भी आन्दोलन करने वालों को मिला। यह कैसे रुके इसमें सबसे बड़ी बाधा यही है कि राजनीति के अलावा हमारा प्रशासनिक और सुरक्षा संगठन भी इससे मुक्त नहीं है इसलिए इस खतरे का मुकाबला कैसे होगा और नियंत्रण के लिए उपाय, साधन और कार्यकारी कहां से लाए जाएंगे, यह भी विचारणीय प्रश्न ही है।
जनप्रतिनिधित्व कानून का निर्माण राजनीतिक दलों द्वारा संचालित सरकारें ही करती हैं इसलिए चुनाव के स्वरूप में परिवर्तन के प्रयत्न तो कई बार किए गए लेकिन आधे से अधिक मतदाताओं की राय ही जीत का कारण बन सके यह उपाय नहीं ढूंढा जा सका। इसलिए वोटों का बंटवारा चुनाव का अंग बन गया है । जहां तक 'पेड न्यूजझ् रोकने का प्रश्न है, वह तो नए-नए रूप दाखिल करता आ रहा है। इसे करने वाले यह बेहतर ढंग से समझते हैं कि वे कैसे कानून से भी बचें और जो अपने प्रचार के लिए इसका प्रयोग करना चाहता है उसको लाभ भी पहुंचे। बिहार चुनाव में इन सब प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने का दायित्व तो चुनाव आयोग का होगा लेकिन उसकी अधिकार सीमाएं, क्षेत्र में कितना आता है, इससे इन वर्गों को कोई घबराहट नहीं है। इसलिए बिहार का चुनाव चाहे कम चरणों में हो या अधिक, वास्तव में कितना निष्पक्ष होगा, यही देखना है।
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