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दिल्ली से यूपी तक बिहार चुनाव की गर्माहट

castगणेश कुमार मेहता.मुजफ्फरपुर .:मेरठ, दिल्ली, मुरादाबाद, बरेली, लखनऊ, गोरखपुर और मुजफ्फरपुर के बीच लोग आते रहे जाते रहे मगर चर्चा बस बिहार चुनाव की। हर जगह बिहार चुनाव की गर्माहट महसूस की जा सकती थी। यूपी में पंचायत चुनाव चल रहा है मगर वहां की चौपाल में भी बिहार चुनाव छाया रहता है।


मेरठ से दिल्ली तीन घंटे-बस का सफर: ‘शाम में अमेरिका और दूसरे दिन सबेरे बांका में थे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। भाई साहब, तन होगा अमेरिका में मन तो बिहार में ही होगा। यूपी और बिहार कहने को तो राज्य है मगर यहां के चुनाव का मतलब देश का चुनाव होता है। बड़े-बड़े सुरमाओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।’ आगे से दूसरी सीट पर मेरे बगल में बागपत के हरिओम भड़ाला बैठे थे। उनके हाथ में अखबार था और अंदर के पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो। बिहार केबांका जिले में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।


भड़ाला ने ठेठ हरियाण्वी अंदाज में कहा ‘भाई देक्खो, यू मोदी कल अमरिका में था, आज्ज बांका में। वोट लेण अमरिका से उड़ के चला आ’। हमने जब पूछा ताऊ बिहार चुनाव की खबर पढ़ते हो। ताऊ समझ गए बिहारी है। और फिर क्या बस में तीन घंटे का सफर बिहार चुनाव के नाम पर कट गया। हरिओम के बगल में बैठे मोदीनगर के राजीव त्यागी ने कहा अभी तो बस बिहार चुनाव ही है। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक की प्रतिष्ठा दांव पर है। बिहार के चुनावी समीकरण की बारीकियों को समझाते हुए हरिओम भड़ाला ने कहा कि भाजपा, कांग्रेस तो है ही असली हीरो तो नीतीश और लालू हैं। उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर है। हर पार्टी ने अपना घोड़ा खोल रखा है और उसे रोकने के लिए दूसरे लोग उनके पीछे पड़े हैं। चुनाव दिल्ली जैसा होगा। अंत तक किसी को पता नहीं चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा। पीछे से आवाज आती है ताऊ बिहार में पंचायत नहीं विधानसभा का चुनाव है। दोनों एक जैसा कैसे होगा। दरअसल यूपी में अभी पंचायत चुनाव चल रहा है। भड़ाला ने कहा म्हारे  बेवकूफ समझयो है कू। म्हारे पता है कि विधानसभा चुनाव है, मगर म्हारे मतलब जात्ति-पात्ति से है। बस में बैठे लोग चर्चा में मशगूल थे। इसी बीच बस आईएसबीटी पहुंच चुकी थी।


अब लगता है भाईजान सरकार बनवाकर ही लौटेंगे
दिल्ली से मुजफ्फरपुर-गरीब रथ: ट्रेन पंजाब से सहरसा जाती है। सफर में पंजाबी भी थे। दिल्ली के भी थे मगर बहुतायत में संख्या बिहारी और यूपी के लोगों की थी। ट्रेन के अंदर का तापमान भले की बीस डिग्री के आसपास हो मगर चुनावी पारा यहां भी अधिक था। हमारे पीछे जो साहब थे उनके पास इतना सामान था मानो दिल्ली खरीदकर बिहार जा रहे हों। एक साहब ने लखनवी अंदाज में कह दिया अब लगता है भाईजान बिहार में सरकार बनवाकर ही लौटेंगे। दूसरे ने कहा नहीं भाई साहब अब तो लौटेंगे ही नहीं। अपनी सीट की ओर बढ़ रहे साहब ने कहा भाई मैं तो लौटूंगा ही, यहां नौकरी करता हूं। मगर अगर मेरे मनमुताबिक सरकार बनी तो बिहार की बड़ी आबादी को शायद लौटना न पड़े। बस क्या था, चुनावी बहस शुरू हो गई। सरदारजी ने कहा, बिहार में घमासान है। जाना सही नही है। हमने कहा ऐसा क्यों? मेरे सवाल का उत्तर जब तक सरदारजी देते, चटर्जी सहित कई लोग बोल पड़े, अब स्थितियां बदल गई हैं सरदारजी। from livehindustan.com



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