पटना.बिहार विधानसभा के लिए पांच चरणों में चला चुनाव संपन्न हो गया है। इस दौरान देश-प्रदेश के नेताओं के बोल उछाले गए, मुद्दे और वार-पलटवार का दौर चलता रहा। जनता ने इस चुनावी गहमा- गहमी को वोटों के जरिए व्यक्त किया, जो ईवीएम से कल बाहर आएगा। इस सूरते हाल को कार्टूनिस्ट पवन और कवि विजय गुंजन ने कैसे व्यक्त किया, प्रस्तुत है कुछ बानगी।

कोई कहता भूत है, कोई कहे पिशाच, ढोलक-झांझर-झाल ले रहे गली में नाच। रहे गली में नाच सबके सब बड़बोले, खूब तमाशा देखती जनता मुंह ना खोले। कह गुंजन कविराय मौन-मूक मतदाता, चुपके से कर देता, सबसे बड़ा तमाशा।

देखे कितने रंग में बहुरुपियों को भाय, गिरगिट जिनको देखकर क्षण में जाय लजाय। क्षण में जाय लजाय, जीत जाएंगे जब वे, दाल गलाएंगे दल के दलदल में तब वे। कह गुंजन आवरण बदल कितने हैं फेंके, रंग भेद में रंगते इनको सबने देखे।

छक्के पर छक्के रहे खद्दरधारी मार, द्वारे-द्वारे बोलते वे ही तरणहार। वे ही तारणहार वोट दो उन्हें जिताओ, पूरी ताकत दे गद्दी पर उन्हें बिठाओ, कह गुंजन कविराय बाद में वे ही देंगे धक्के, प्याज-दाल के बैट-बॉल से मार रहे जो छक्के।

खेती उत्तम है यहां राजनीति की यार, जाति-धर्म को जल बना सींचो खेत बधार। सींचो खेत बधार खाद अगड़ी पिछड़ी है, ऊपर से आरक्षण की गहरी तिकड़ी है। कह गुंजन कवि संप्रदाय की थामो रेती, फसल उगायेगी सुंदर नफरत की यह खेती।

दागी भी मैदान में ठोक रहे हैं ताल, उनको छोड़ेंगे नहीं गटक गये जो दाल। गटक गये जो दाल खाल में छिपे भेडिए, बटन दबायें कसकर उनके दांत तोडिए। कह गुंजन जो कल थे संगी, हैं अब बागी, लोकतंत्र के दाग छुड़ायेंगे अब दागी।


जंतर-मंतर टोटका, झाडू-फूंक करवाय, कुर्सी की चाहत जाने कहां-कहां ले जाय। कहां-कहां ले जाय मंत्र ओझा फूंकेगा, सम्मोहन का धुआं कि जन-मन में धूंकेगा। कह गुंजन कविराय न आनेवाला अंतर, जन के आगे काम न आये जंतर-मंतर।

भूखे जन के थाल में दाल हुई अब गौन, दर्द लिए दिल में यहां जनता है अब मौन। जनता है अब मौन तेज है धड़कन सबकी, ऊहापोह में सब दल, दाल गलेगी किसकी। कह गुंजन कवि भाव सभी के मन के रूखे, आखिर कब तक भजन करेंगे जन-मन भूखे।


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